वो मोहब्बत का मारा समझता रहा
उसकी बाहों में पिघलती रही रातभर
बिस्तर की सलवटें देखती रहीं ....
किसकी यादों में जलती रही रातभर
बदन की सतह तक ही रहे सारे निशां उसके
रूह को कोई और ही खुशबू महकाती रही रातभर ...
चेहरे पे बिखरा रहा तब्बस्सुम का उजाला मगर,
कोरे मन को इक याद रुलाती रही रातभर.
अगले जन्म में मिलने का वादा है उनका
आज फिर दुआ मौत की मनाती रही रातभर