Friday, September 2, 2011

yaadein...


वो मोहब्बत का मारा समझता रहा
उसकी बाहों में पिघलती रही रातभर
बिस्तर की सलवटें देखती रहीं ....
किसकी यादों में जलती रही रातभर
बदन की सतह तक ही रहे सारे निशां उसके
रूह को कोई और ही खुशबू महकाती रही रातभर ...
चेहरे पे बिखरा रहा तब्बस्सुम का उजाला मगर
कोरे मन को इक याद रुलाती रही रातभर.
अगले जन्म में मिलने का वादा है उनका
आज फिर दुआ मौत की मनाती रही रातभर

dard ka rishta...


बहुत लोग आये जिन्दगी मे,
जिनके सन्ग मुस्कुरायी हूँ
जितनी देर उनके साथ रही
बिना बात भी खिलखिलायी हूँ.
हँसी हँसी मे बने रिश्ते मगर
लोगो ने हँसी मे ही उङाये
एक आँसू का रिश्ता है अपना
शायद ये उम्र भर निभ जाये....

यूँ भी सुना है लोगो से
दर्द के रिश्ते होते है गहरे
गम रह् जाते है उम्र भर
सुख के पल दो दिन ना ठहरे
जख्म भर भी दे वक्त अगर
निशाँ कुछ न कुछ रह जाये,
एक आँसू का रिश्ता है अपना
शायद ये उम्र भर निभ जाये....

BAL VIDHVAA


दर्द के साये में भी जवां हो गयी ख्वाहिशें,
तमाम बन्दिशें फिर भी मिटती नहीं तमन्नायें,
बालविधवा हूँ, कितना समझाया मन को,
फिर् भी बाँवरा मन करे नित नयी कामनायें

बचपन से देखा तन पर श्वेत वस्त्र ही,
क्या करुँ जो मन रंगों को देख अकुलाता है,
सुनकर खनक चूड़ियों की किसी कलाई में,
मन फिर मन है, कभी मचल ही जाता है.

ना देश के लिये ना अपने लिये,
मिटा रहा मेरा जीवन समाज किसके लिये.
जिसे ना जाना ना समझा कभी मैने,
सारी उम्र आँसू कैसे बहाऊँ उसके लिये.

ईश्वर का वरदान है ये मानव जीवन,
ना जलाओ चिताओं के साथ अबलाओं को...
बदला है वक्त, बदलो ये समाज भी,
अब चिता नहीं, डोली दो इन विधवाओं को.............

जब कभी महसूस करो अकेलापन
अपनी तन्हाई से घबरा जाओ,
भर आयें आँखें यूँ ही अचानक
और कारण तुम समझ न पाओ....

तो बेचैन हूँ मै भी तुम्हारी याद में
ये अनुमान सहज लगा लेना ,
पलके बंद कर याद करना मुझे
ख़्वाबों में अपने पास बुला लेना...

जाति की कोई बंदिश होगी
ना रिवाजों के वंहा पहरे होंगे,
ख़्वाबों की दुनिया में हम तुम
सबसे दूर अकेले होंगे ..

कर लेना फिर बातें मुझसे चाहे जितनी
फिर अपनी निगाहों से छू जाना मुझे
प्यार एक दिन रंग लायेगा अपना
हौसला फिर थोडा दे जाना मुझे

Monday, August 29, 2011

Eagerly waiting to Relish, Refresh n Relive my childhood memories with school pals......

जिनसे बंधा था विश्वास का पहला बंधन,
जिनसे सीखे थे पहले सबक दोस्ती के ..
जिनकी यादें हैं बचपन के हर मोड़ पर,
चलो मिलकर बैठें वो साथी सारे बचपन के

जहाँ गिर गिर कर संभलना सीखा था,
फिर गुलज़ार करें वो स्कूल का आँगन
फिर हो जाएँ कुछ शरारतें, खेलकूद और मस्ती
चलो फिर जी लें मिलकर अपना बचपन.

नौकरी की चिंता, जिम्मेदारियों के अहसास,
एक दिन के लिए सब पीछे छोड़कर आना...
यूनिफार्म की बाध्यता नहीं, है बस शर्त यही..
बचपन दोहराने मन से बच्चा बनकर आना 

Tuesday, December 28, 2010

meri tumhari dastaan...

कँहा से शुरु हुई थी
और कँहा जाकर खत्म हुई,
ये मेरी तुम्हारी दास्ता,
कुछ याद नहीँ.......

कँहा इसका आगाज़ था
क्या अन्जाम हुआ इसका,
या अभी अधूरा ही है किस्सा,
कुछ याद नही...

बस ये खबर है कि
अब ये कभी पूरा होगा नही
छूटी थी बात अधूरी कँहा
कुछ याद् नही.......

मुमकिन है तुम भी भूल जाओ
जिन्दगी के अगले मोड़ तक हमे,
तुम हमे याद हो कि नही
कुछ याद नही...........
अंजुरी भर पानी से ,
बरसों की अतॄप्त प्यास
मिटती नहीं है
...
और बढ़ ही जाती है.
पल भर की बारिश 
हो जाये अगर बेमौसम
मिट्टी भीगेगी तो क्या
पल भर को महक जाती है.....
मगर कुछ पाने की आस 
फिर हद से गुजर जाती है...
अब अगर मिल जाओ कहीं
फिर ना देना मुझे
अंजुरी भर प्यार का उपहार....